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"अपनी ही भाषा उपेक्षित क्यों?" — संगम त्रिपाठी का सवाल*



_रमेश ठाकुर - पश्चिम चंपारण,बिहार_

_दिनांक:- 28-07-2025_


प्रेरणा हिंदी प्रचारिणी सभा के संस्थापक, साहित्यकार व कवि संगम त्रिपाठी ने हिंदी की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए इसे गहरे चिंतन का विषय बताया है। उन्होंने कहा कि यह विडंबना ही है कि भारत — जो विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है — के पास आज भी अपनी कोई औपचारिक राष्ट्रभाषा नहीं है, जबकि विश्व के अनेक ऐसे देश हैं जहां बहुभाषिकता होते हुए भी एक मान्य राष्ट्रभाषा स्थापित है।


कवि त्रिपाठी ने कहा कि हिंदी केवल एक भाषा नहीं, हमारी संस्कृति, हमारी अस्मिता और हमारी पहचान की जीवंत अभिव्यक्ति है। लेकिन आज दुर्भाग्यवश, अपने ही देश में हिंदी को विरोध और उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है, जो कि हर भारतीय के लिए सोचने और चेतने का विषय है।


उन्होंने स्पष्ट किया कि हम सभी भाषाओं का सम्मान करते हैं और हर भाषा ज्ञान का माध्यम है। परंतु यह भी उतना ही ज़रूरी है कि हम अपनी मातृभाषा हिंदी को उसका उचित स्थान दिलाएं। आज हम विश्व मंच पर हिंदी को स्थापित करने की बातें तो करते हैं, लेकिन अपने ही देश में इसे हाशिए पर डाल दिया गया है।


“हम खुद अपनी भाषा को भूलते जा रहे हैं और उम्मीद करते हैं कि बाकी दुनिया उसे अपनाए। यह दोहरा रवैया आत्मचिंतन मांगता है।” – संगम त्रिपाठी


उन्होंने देश के तमाम साहित्यकारों, पत्रकारों, शिक्षाविदों, साहित्य मनीषियों, कलमकारों और हिंदी प्रेमियों से आह्वान किया कि वे एकजुट होकर हिंदी को उसका अधिकार दिलाने के लिए प्रयास करें। उन्होंने अपील की कि यह मुहिम सिर्फ साहित्यिक मंचों तक सीमित न रहे, बल्कि सत्ता के गलियारों तक पहुँचे।


त्रिपाठी जी का मानना है कि जब तक हिंदी को उसका संवैधानिक, शैक्षणिक और प्रशासनिक स्तर पर सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक न तो हमारी भाषा बचेगी, न ही हमारी सांस्कृतिक पहचान।


उन्होंने कहा — “यह समय है कि हम सब मिलकर हिंदी के पक्ष में सार्थक प्रयास करें। तभी हमारी भाषा बचेगी, तभी हमारी संस्कृति सुरक्षित रह सकेगी।”

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